Friday, 18 October 2013

सामंतवादी सपने में चलता देश

तेरह अक्टूबर को दतिया के एक मंदिर में भगदड़ मचने से करीब 115 लोग मर गए और सौ से अधिक घायल हो गए.उस से एक दिन पहले मैंने सावधान इंडिया में एक कार्यक्रम देखा जिसमें दिखाया गया था कि एक व्यक्ति का दूसरे शहर में ट्रांसफर होता है.वहां के एक स्कूल में उसकी बेटी दाखिला लेती है,जो जींस पहनकर स्कूल जाती है.वहां एक लड़का अपने साथियों सहित भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए ऐसी लड़कियों को धमकाता है और उसके खौफ से ऑटो वाले जींस पहनने वाली इन लड़कियों को स्कूल छोड़ने नहीं जाते.उस लड़की ने पुलिस में कंप्लेंट की पर पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की.लड़की की माँ ने उस गुंडे का विरोध किया तो उसने उसी का मर्डर कर दिया.पुलिस ने उसे पकड़ा पर एक नेता ने यह कह कर उसे उसे छुड़वा दिया कि वह भारतीय संस्कृति की रक्षा कर रहा है.लड़की ने अपने स्कूल की छात्राओं के साथ मिलकर प्रदर्शन किया और अंत में उसे गिरफ्तार किया गया.यह टीवी प्रोग्राम सत्य घटनाओं पर आधारित होता है.
आठ-दस दिन से लाइफ ओके पर महादेव सीरियल में तंत्र-मन्त्र को बढ़ावा देने वाली चीज़ें दिखाई जा रही हैं.इस तरह के सीरियलों में तंत्र-मन्त्र,जादू-टोना,भाग्य,ब्राह्मणवाद और धार्मिक अंधविश्वासों को बेहद मज़बूती से स्थापित किया जाता है और सबसे खतरनाक यह है कि इन में यह स्थापित किया जाता है कि यह सब देवी-देवता व ईश्वर की इच्छा से होता है और उसके पीछे उनका मूल उद्देश्य मानवता की भलाई करना है.इन सीरियलों के अलावा ज्योतिष,तंत्र-मन्त्र,भूत-प्रेत जैसी तमाम चीज़ें चैनलों पर रात-दिन चलती ही रहती हैं.
        कुछ दिन पहले नरेंद्र दाभोलकर की हत्या हुई थी वे जन्तर-मंतर ,जादू-टोना और तथाकथित भगवानों के विरुद्ध एक क़ानून बनाने की मांग कर रहे थे और इस मांग का भाजपा,शिवसेना सहित कई हिन्दू संगठन विरोध कर रहे थे.उसके बाद भगवान को अपना यार बताने वाले,धार्मिक गुरू आसाराम पर बलात्कार का आरोप लगा और उसके साथ ही उसके पुत्र नारायण साईं पर बलात्कार का आरोप लगा है और वह अभी तक पुलिस की पूछताछ से भाग रहा है और इन दोनों के तमाम अपराधों का रोज़-रोज़ खुलासा हो रहा है.भाजपा आसाराम का समर्थन करती रही है और कुछ हिन्दू संगठन के लोग चैनलों पर आसाराम के बचाव में जमे हुए हैं.
   अभी एक साधू ने सपना देखा है कि उन्नाव में एक हज़ार टन सोना गड़ा है.एक केन्द्रीय मंत्री साधू का भक्त है और उसने सरकार से सिफारिश कर वहां खुदाई शुरू करा दी है.इससे यह पता चलता है कि इस देश में साधू कि हैसियत क्या है .
  चंद दिनों में घटी इन तमाम घटनाओं को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इस देश में अंधविश्वास व धर्म की जड़ें कितनी गहरी हैं.ऐसे में आसाराम जैसे लोग भी करोड़ों लोगों को धर्म के नाम पर इधर से उधर रौंदे फिर रहे हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

   आज़ादी के बाद देश में पूंजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था ज़रूर कायम हुई परन्तु पुरानी सामंतवादी व्यवस्था समाप्त नहीं हुई और वह अपने धार्मिक स्वरूप में कट्टरता के साथ उभरती रहती है.एक तरफ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा जैसी घोषित धार्मिक राजनीतिक पार्टियां हैं तो दूसरी ओर दूसरी राजनीतिक पार्टियां अवसरानुसार अपने फ़ाइदे के लिए धर्म का साम्प्रदायिकता की हद तक इस्तेमाल करने से नहीं हिचकिचाती हैं.अपने धार्मिक स्वरूप में सामंतवाद अभी भी भारतीय समाज में गहराई तक जड़ें जमाए हुए है और हमारी राज्य व्यवस्था उसकी जड़ों को निरंतर खाद-पानी देती है.लोगों की धार्मिक जड़ता उनके लिए फ़ाइदे की चीज़ है.ऐसे में रामदेव व आसाराम जैसे लोग धर्म की आड़ में अपना हज़ारों करोड़ का गोरखधंधा चला रहे हैं,करोड़ों लोग धर्म उपदेशकों के पीछे दौड़े फिर रहे हैं , पूजास्थलों में मारे फिर रहे हैं और वहां मची भगदड़ में अपनी जान गँवा रहे हैं,धार्मिक अंधविश्वासों का विरोध करने वालों को धार्मिक संगठन न सिर्फ धमकियां दे रहे हैं बल्कि दिन दहाड़े उनकी हत्या भी कर रहे हैं,संस्कृति बचाने के नाम पर महिलाओं को गुंडे दौड़ा-दौड़ा कर पीट रहे हैं और प्रशासन मूक दर्शक बना हुआ है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए. समाज को धार्मिक कूपमंडूकता से निकालने के लिए इसे बढ़ावा देने वाले हर मोर्चे के विरुद्ध मोर्चा खोलना पडेगा और यह काम इस लिए आसान नहीं होगा क्यों कि राज्यसत्ता इन्हें पूरा संरक्षण देती है.

Friday, 30 August 2013

आसाराम को कौन खाद-पानी देता है


आसाराम पर बलात्कार जैसे घिनौने  आरोप के बाद यह बात लगातार चर्चा में आ रही है कि गलती उन लोगों की ही है जो अपनी स्त्रियों को आसाराम जैसे लोगों के पास भेजते हैं,इतना सब कुछ जानने के बाद भी आसाराम जैसे लोगों के अंधभक्त बने रहते हैं.ऐसे समय में इस तरह की चर्चा होना अस्वाभाविक नहीं है.लेकिन इस तरह की चर्चा करने वालों में वे लोग भी हैं जो भले ही आज आसाराम के विरोध में खड़े हैं पर वे आसाराम में न सही उसके जैसे किसी दूसरे आसाराम में विश्वास करते हैं.उनसे इस विषय पर बात करोगे तो वे यही तर्क देंगे कि उनका आसाराम असली है,वह ऐसा बलात्कारी और ढोंगी नहीं है.इस तरह देखा जाए तो सत्रह अगस्त तक उनका आसाराम भी ढोंगी और बलात्कारी नहीं. दरअस्ल देश में जबरदस्त अंधश्रद्धा है उसके बहुत सारे कारण समाज में मौजूद हैं.यह कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं है कि डॉ डाभोलकर ने अन्धविश्वास विरोधी क़ानून बनवाने के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी और उनके इस बिल में अपने आप को भगवान कहने वालों के लिए सज़ा की बात कही गयी थी.देश सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में से एक भाजपा डाभोलकर के विरोध में थी और तथाकथित भगवान् आसाराम पर बलात्कार का आरोप लगते ही वह उसके पक्ष में आ गयी.देश में लोग इस कदर अन्धविश्वासी क्यों बने हुए हैं इस पर तो पूरी एक पुस्तक लिखने की ज़रुरत है हम फौरी तौर पर कुछ कारणों पर नज़र डाल लें तो भी कुछ हद तक बात स्पष्ट हो जाएगी.
आसाराम का मामला धार्मिक है और लोगों की श्रद्धा और आस्था का मामला है.यह कहा जा सकता है कि श्रद्धा होनी चाहिए अंधश्रद्धा नहीं.अगर गौर से देखा जाए तो धर्म के मामले में श्रद्धा और अंधश्रद्धा जैसा कोई अंतर होता ही नहीं है.जो धार्मिक व्यक्ति यह कहता है कि अंधश्रद्धा नहीं होनी चाहिए वह कुछ सेलेक्टिव अंधश्रद्धाओं में विश्वास करता है जिन्हें वह श्रद्धा कहता है, इसी तरह दूसरा धार्मिक व्यक्ति कुछ दूसरी अंधश्रद्धाओं में विश्वास करता हो वह पहले वाले की श्रद्धाओं को अंधश्रद्धा कह सकता है.इस बात को यों भी समझ सकते हैं कि एक बेहद कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति धर्म के मामले में कोई तर्क न कर पाए और आपसे सीधे तौर पर कह दे,आपको मानना है मानो हम तो यों ही मानते हैं,मानो तो देव नहीं मानो तो पत्थर. एक बहुत पढ़ा-लिखा व्यक्ति कुछ देर आपसे बहस करे और उसके बाद कह दे यह तर्क का विषय नहीं है आस्था का विषय है.दरअस्ल धर्म के मामले में यह मूल मन्त्र बन गया है.यही बात आसाराम के भक्तों पर लागू होती है.आसाराम ने बलात्कार किया है या नहीं किया है उनके लिए यह तर्क का विषय है ही नहीं उनके लिए तो यह आस्था का विषय है कि आसाराम भगवान हैं और वे ऐसा कर ही नहीं सकते.इसी तरह दूसरे लोग जो इसे इनकी अंधश्रद्धा कह रहे हैं, वे कभी यह मानने को तैयार नहीं होंगे कि हमारे तीन-तीन ईश्वर एक महिला सती अनुसुइया को नंगा होकर खाना खिलाने को कहें या देवताओं का राजा इंद्र अहिल्या नाम की महिला के सत की परिक्षा करने के लिए उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाए इस तरह की बातों में विश्वास करना अंधश्रद्धा है.आसाराम जैसा ही काम कोई देवता या ईश्वर करे तो लोगों की आस्था में देवता या ईश्वर के प्रति कोई कमी नहीं आती ऐसे ही आसाराम के भक्तों में भी अपने भगवान् के प्रति कोई कमी नहीं आती.
समाज में अंधश्रद्धा के इतने साज़ो-सामान हैं कि आसाराम जैसे दुराचारी व अपराधी व्यक्ति के भी लाखों-करोडो अंधभक्त आसानी से बन सकते हैं.सबसे पहले तो हमारी राजव्यवस्था ही इसे बेहद बढ़ावा देती है.आसारामों से अटल बिहारी,आडवानी,इंद्रा गांधी सब आशीर्वाद लेकर यह सन्देश देते हैं कि इन्ही कि कृपा से देश चल रहा है.सिर्फ नेता ही नहीं कोर्ट तक इन लोगों को बढ़ावा देता है.निर्मल बाबा कृपा बाँटते हैं.वे भक्तों को गोलगप्पे खिलाकर या काला कुत्ता दिखा कर कृपा देते हैं.इस पर किसी ने जनहित याचिका डाल दी तो कोर्ट ने फैसला दिया कि वे ऐसे उल-जुलूल उपाय न बताएं.मतलब वे अपना धंधा चलाएं पर लोगों की आस्था के साथ इतना मूर्खता पूर्ण मजाक न करें.निर्मल बाबा मान गए .टीवी देखिए वे आजकल लोगों की आस्था से इतना मूर्खतापूर्ण मजाक नहीं करते.राज्यव्यवस्था ऐसा क्यों चाहती है यह समझना भी कोई मुश्किल काम नहीं है.वर्तमान व्यवस्था ने आम आदमी की ज़िंदगी इतनी मुश्किल बना दी है कि अगर वह उसे चला पाने में समर्थ हो जाता है तो उसे दैवीय चमत्कार समझने लगता है.नौकरी पाने के लिए,केस जीतने के लिए बच्चों के रिश्तों के लिए हर काम इतना मुश्किल है कि लोग सहज ही ज्योतिषी,बाबा, पीर फकीर के चक्करों में पड़ जाते हैं .एक परचून की दूकान डालने से लेकर बिजनेस डालने तक ज़बरदस्त संघर्ष है.ऐसे में आसाराम उन्हें एक ताबीज़ दे दे और उनका धंधा चल जाए तो वे आसानी से उसके भक्त बन जाते हैं.इस केस में भी लड़की के पिता का साधारण सा परिवार था .उन्होंने ट्रांसपोर्ट का काम डाला,वे आसाराम से मिले,मेहनत की धंधा चल निकला और पूरा परिवार आसाराम का भक्त बन गया.ऊपर से व्यवस्था में इतनी अराजकता है कि लोगों को लगता है सब कुछ ईश्वर ही चला रहा है.
    समाज पर सबसे अधिक प्रभाव मीडिया का है.टीवी,फ़िल्में ,अखबार हर जगह तंत्र,मन्त्र,चमत्कारों का बोल बाला है.हनुमान यंत्र शुभ धन वर्षा जैसे कितने ही विज्ञापन टीवी पर आते हैं जो हर समस्या तीन-चार हज़ार में हल कर देते हैं.महादेव,सावित्री जैसे सेरिअलों में ही नहीं जोधा-अकबर जैसे ऐतिहासिक सीरियलों में भी अंधविश्वासों को बढ़ावा दिया जाता है. गणेश के दूध पीने की खबरें चंद मिनिटों में दुनिया भर में फ़ैल जाती हैं.लोगों को अन्धविश्वासी बनाए रखने में मीडिया ज़बरदस्त माहौल तैयार करता है लोगों का यही अंधविश्वास आसारामों को जन्म देता है.
    तमाम सामाजिक वजहों से परिवारों में तमाम तरह के धार्मिक पाखण्ड चलते रहते हैं और ऐसे परिवारों में बच्चा पैदा होता है तो उसमें यही पाखण्ड जन्मजात लक्षणों की तरह पनप जाते हैं.बच्चा बड़ा होकर डॉक्टर बन जाए,इंजीनियर बन जाए या वैज्ञानिक बन जाए इन लक्षणों को अपने अन्दर से निकालना बहुत मुश्किल होता है. यही वजह है कि आसारामों के अंधभक्तों में डॉक्टर,इंजीनियर,वैज्ञानिक सब होते हैं

Sunday, 21 April 2013

दुनिया को नर्क बना रखा है देवों के देव महादेव ने


             
        २८ मार्च को राजस्थान के स्वामी माधोपुर जिले के गंगापुर सिटी के रहने वाले एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी,भाई,पुत्र व पुत्री के साथ मिलकर ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली। उसने मरने से पहले एक विडियो बनाया और उसमें बताया कि वे लोग क्यों आत्महत्या कर रहे हैं. पुलिस छानबीन से पता चला कि वह परिवार अति धार्मिक प्रवृत्ति  का था .धार्मिक आयोजनों में काफी हिस्सा लेता था, यहाँ तक कि टीवी पर भी धार्मिक सीरियल ही देखता था। वह महादेव सीरियल से बहुत प्रभावित था।बहुत से लोग ये तर्क दे सकते हैं कि महादेव सीरियल तो पूरा देश देखता है और किसी ने तो आत्महत्या नहीं की।अब वह परिवार मूर्ख था तो इसमें महादेव सीरियल का क्या दोष है।  
      हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं और यह विज्ञान का युग है। विज्ञान ने आज चाँद सितारों तक की दूरियां तय कर ली हैं।लेकिन विडम्बना है कि तमाम तरक्की के बाद भी आज समाज की सोच आदिम सामंती संस्कृति की सोच से ऊपर नहीं उठ पाई है।उसकी बड़ी वजह यह है कि शासक वर्ग ने समाज का ऐसा ताना वाना बुन रखा है कि वह अपने हित के लिए समाज की सोच को ऊपर नहीं उठने देना चाहता।यही वजह है कि तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बाद भी समाज का पढ़ा लिखा तबका भी अपनी पुरातनपंथी सोच से बाहर नहीं आ पाया है। उसकी वजह यही है कि  शासक वर्ग के पास जनता की चेतना को कुंद करने के तमाम हथियार हैं। वह चाहता है कि जनता की समझ वहीं तक विकसित हो जहां तक उसके हित में है।यह बिना वजह नहीं है कि निर्मल बाबा(और ऐसे तमाम बाबाओं)के दरबार में जनता की काफी भीड़ जुटती है,पढ़े लिखे लोग उसके बेहूदे उपाओं पर विशवास करते हैं,टीवी चैनलों पर निर्मल बाबा के कार्यक्रम छाए रहते हैं।
                  विजुअल मीडिया का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। तमाम चैनल जिस तरह राशिफल,तंत्र-मन्त्र,बाबाओं और धार्मिक सीरियलों को परोसते हैं उसने जनता की सांस्कृतिक चेतना को मटियामेट कर दिया है और वह उसे फिर उसी आदिम युग में ले जाना चाहते हैं।ऐसे में किसी परिवार के पांच सदस्य ज़हर खाकर देवों के देव महादेव से मिलने चले जाते हैं या हज़ारों महिलाएं डाइन बता कर मार दी जाती हैं या तंत्रमन्त्र के चक्कर में लोग पड़ौसियों, जहां तक कि अपने ही बच्चों की बलि दे देते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए।  अन्धविश्वास से लेकर परम शक्ति यानी ईश्वर से सम्बंधित जो सीरियल टीवी पर दिखाए जाते हैं वे हमारी सांस्कृतिक चेतना को एक ही जगह ले जाते हैं परन्तु इनमें एक बहुत बड़ा अंतर है। हो सकता है एक धार्मिक व्यक्ति तंत्र मन्त्र को सही मानता हो और दूसरा ग़लत या एक धार्मिक निर्मल बाबा को ढोंगी मानता हो और आशा राम बापू का भक्त हो जबकि दूसरा आशा राम को ढोंगी मानता हो और निर्मल बाबा का भक्त हो लेकिन जो इस तरह के धार्मिक सीरियल हैं उनमें सभी धार्मिक  अंधी श्रद्धा रखते हैं। इस बात को एक उदाहरण से समझते हैं।
         कुछ दिन पहले टीवी पर ऐसे बहुत से विज्ञापन आ रहे थे जो विशेष छूट के साथ तीन-साढ़े तीन हज़ार में लक्ष्मी यंत्र कुबेर की चाबी आदि देते थे जिसकी स्थापना के बाद खरीदने वाले का घर दौलत से भर जाएगा। बहुत से धार्मिक व्यक्ति इस पर विशवास नहीं करते होंगे।लेकिन यही बात महादेव सीरियल में कुबेर वाले एपीसोड में दिखाया गया है जिस पर हिन्दू माइथोलोजी में विश्वास करने वाला हर व्यक्ति विश्वास करेगा।जहां तक कि उसके विश्वास करने या न करने का कोई सवाल ही नहीं उठता यह बात उसके अवचेतन में सीधे प्रवेश कर जाती है।कुबेर में अपने धन के प्रति लोभ पैदा हो जाता है।महादेव उसे फटकारते हैं कि लोगों में असंतोष बढ़ रहा है,दुनिया में जिनके पास धन है उनका दायित्व है कि वे अपना धन संसार आवश्यकताओं में लगाएं।दरअस्ल यहाँ महादेव पूंजीवाद के असमानता के अन्तर्विरोध को उसी उपदेशात्मक तरीके से हल कर देते हैं जैसे अब तक गली मोहल्ले के कथा वाचक हल करते आ रहे हैं।साथ ही वे निर्धनों को आश्वस्त करते हैं की वे अपने काम में लगे रहें उन्होंने कुबेर को डांट कर ठीक कर दिया है वह एक दिन आपके लिए भी अपना खजाना खोल देगा।
             राजा- महाराजाओं के समय में लिखी गईँ ये  धार्मिक कथाएं शासक वर्ग के हितों के लिए वर्तमान समाज को पुराने सामंती मूल्यों की जकडबंदी में जकड़े रखना चाहती हैं। देवताओं का राजा इंद्र है।उसमें वे सारे गुण हैं जो उस समय राजा महाराजाओं में होते थे।धूर्तता,मक्कारी,अय्याशी और हमेशा अपने राज्य के लिए चिंतित। इससे यही पता चलता है कि जिस दौर में ये कथाएँ लिखी गईं उस दौर में इन्हें इसी तरह सोचा जा सकता था। लेकिन अफ़सोसजनक यह है कि इन कथाओं का धार्मिक जनमानस में काफ़ी प्रभाव है और शासक वर्ग जनता की मानसिकता को उन्हीं सामंती मूल्यों में जकड़े रखने के लिए इन कथाओं का इस्तेमाल कर रहा है।
        महादेव बार -बार यह बात दोहराते हैं कि कैलास, उनका परिवार सिर्फ उनका परिवार नहीं है,वह संसार के लिए एक आदर्श है।सही भी है।महादेव यानी इस सृष्टि के ईश्वर को शादी और बच्चे पैदा कर परिवार बसाने की भला क्या ज़रुरत है।उन्होंने यह सब संसार के लिए आदर्श स्थापित करने के लिए किया होगा। तब कुछ महिलाएं व पुरुष विवाह नाम की संस्था को स्त्री के विरुद्ध बताते हैं वे भी सही ही बताते हैं।क्योंकि महादेव ने परिवार का जो आदर्श स्थापित किया था वही अभी तक चला आ रहा है और उसे बदलने की ज़रुरत है।इस पारिवारिक व्यवस्था में महादेव विवाहित पुरुष का आदर्श हैं और पार्वती विवाहित स्त्री का।मदादेव एक दूसरे ईश्वर नारायण के साथ मिलकर संसार की फर्जी चिंताओं (ध्यान रहे ईश्वर दुनिया की वास्तविक चिंताओं से निरपेक्ष है) में व्यस्त रहते हैं और पार्वती के तीन काम हैं- स्वामी के मूड को दुरुस्त रखना,बच्चों के भरण पोषण के लिए लड्डू बनाना और उनकी सुरक्षा का ध्यान रखना। वे एक अच्छी गृहणी की तरह हमेशा चिंतित रहती हैं कि बच्चों की सुरक्षा के लिए एक भवन का निर्माण कर लिया जाए। वे बार -बार रट लगाए रहती हैं स्वामी बच्चों की सुरक्षा के लिए भवन का निर्माण कर लिया जाए। महादेव आदर्श स्थापित करते हैं कि प्रकृति के निकट रहने का आदर्श स्थापित करते हैं कि इंसान को भवन की आवश्यकता ही नहीं है।आज जब करोड़ों लोगों के सर पर मकान नहीं है उनके लिए महादेव का यह आदर्श कितना सुन्दर है।कभी कभी महादेव यह कह कर कि पार्वती तुम आदि शक्ति हो यह सन्देश देते हैं कि दिव्य शक्तियों से संपन्न ईश्वर पुरुष रूप में ही नहीं स्त्री रूप में भी होता है।लेकिन पार्वती की शक्ति का संचालन महादेव के अधीन तो है ही वे अपनी शक्ति का उपयोग तभी करती हैं जब महादेव उसकी भूमिका बना देते हैं और उनके बच्चों पर कोई गहरा संकट आने को होता है।वे दुर्गा बन कर महिषासुर को मारती हैं क्योंकि वह उनके पुत्र कार्तिकेय पर हमला करता है।वे काली का रूप धरती हैं क्योंकि हुन्ड नाम का असुर उनके भावी दामाद नहुस को मारना चाहता है।वे एक अच्छी माँ की तरह बेहद चिंतित रहते हुए नहुस को   तत्काल विवाह योग्य बनाने की जिद पकड़ लेती हैं।महादेव के समझाने के बावजूद पार्वती का बार बार जिद पकड़ना समाज में प्रचलित कहावत तिरिया हठ और बाल हठ की ही पुष्टि करता है. पार्वती की जिद पर महादेव अपने जादू से दस-बारह साल के दिखाई देने वाले नहुस को विवाह योग्य पूर्ण युवा बना देते हैं।स्त्री होते हुए भी पार्वती का नहुस को विवाह योग्य बनाने के लिए इतना चिंतित होना और महादेव का उसे विवाह योग्य बना देना सामंती युग में अधिक उम्र के पुरुषों द्वारा कम उम्र की नाबालिग लड़कियों से विवाह करने की प्रवृत्ति का ही प्रतीक है।कैसी विडम्बना है की देश में जब बहस छिड़ी हुई है कि लड़की की यौन स्वीकृति की उम्र सोलह साल हो या अठारह साल हो ऐसे समय में महादेव एक  कम उम्र के लडके को विवाह योग्य बना कर अपनी पुत्री जो विवाह योग्य नहीं है उससे शादी करने का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।आधुनिक युग में भी लड़कियां अच्छे पति के लिए व्रत रखती हैं महादेव सीरियल इसकी सार्थकता की पुष्टि करता है।महादेव की पुत्री बाल्यावस्था में नहुस से विवाह करने के लिए तपस्या करने चली जाती है और लक्ष्मी की पांच बहनें अपने जीजा नारायण से विवाह करने के लिए घोर तपस्या करती हैं।जो कामकाजी महिलाएं यह शिकायत करती हैं कि उनके पति घर में सहयोग नहीं करते उन्हें समझना चाहिए की महादेव और पार्वती ने यही आदर्श प्रस्तुत किया है।
           महादेव जैसे सीरियल समाज की चेतना का जिस तरह क्षरण करते हैं वह समाज की सोच को सदियों पीछे ले जाते हैं। धार्मिक संस्कार किस कदर व्यक्ति की चेतना में अन्दर तक घुस जाते हैं कि व्यक्ति चेतना के स्तर पर उनसे मुक्त भी हो जाए तब भी अवचेतन से ये संस्कार आदत के रूप में प्रदर्शित होते रहते हैं और व्यक्ति को उसका पता भी नहीं चलता।लोग डॉक्टर,इंजीनियर,वैज्ञानिक बन जाते हैं फिर भी उनकी सोच इन्हीं संस्कारों की वजह से एक अनपढ़ अन्धविश्वासी व्यक्ति की सोच से ऊपर नहीं उठ पाती।उनकी इस सोच को बनाए रखने में रामायण,महाभारत,महादेव जैसे सीरियलों का बड़ा योगदान है।                                                          

Saturday, 16 July 2011

पंचतंत्र की कहानी जैसे हैं पुराण

हिंदू धर्म की धार्मिक मान्यताएं पुराणों में वर्णित कहानियों से जुड़ी हैं. जिस तरह पंचतंत्र में नैतिक व बौद्धिक ज्ञान की बातें शिक्षाप्रद कहानियों के माध्यम से समझाया गया है वैसे ही ईश्वर संप्रभुता एवं असीमित शक्ति को सिद्ध करने के लिए पंचतंत्र की कहानियों की काल्पनिक कहानियों की तरह ही पुराणों में कहानियों गढ़ी गई हैं. प्रायः हर धार्मिक कर्मकाण्ड के पीछे ऐसी ही कहानियां जुड़ी हुई हैं. ये कहानियां पूरी तरह काल्पनिक हैं इस बात का पता इसी से चाल जाता है कि किसी तथ्य के पीछे एक पुराण में एक कहानी दी है तो उसी तथ्य के पीछे दूसरे पुराण में अलग कहानी दी है. इससे पता चलता है कि वे दोनों ही कहानी झूठी हैं. जैसे- मथुरा के नजदीक स्थिति गोवर्धन पर्वत का हिंदू धर्म में विशेष महात्म्य है. बताया जाता है द्वापर में भगवान के अवतार श्री कृष्ण ने उसे एक उँगली पर उठाएं रखा था इसलिए वह पर्वत हिंदुओं के लिए पूज्य हो गया. हिंदू अपने पापों से मुक्ति के लिए अथवा किसी कार्य सिद्धि के लिए इस पर्वत की पैदल परिक्रमा करते हैं. वैसे तो इस पठारनुमा पर्वत की परिक्रमा लोग वर्ष भर लगाते हैं. परंतु मुडिया पूर्णिमा(गुरु पूर्णिमा) पर लगे मेले में इस परिक्रमा का महत्व बढ़ गया है और कल 15.07.11 को इस मेले में क़रीब 75 लाख(हिंदुस्तान अखबार के अनुसार)लोगो ने इस पर्वत की परिक्रमा लगाई. इसका महिमा मंडन अखबार ने इस प्रकार किया है- गुरुपूर्णिमा पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा. ट्रेनों में चढ़ने और उतरने में श्रद्धालुओं की सांसे फूल गईं व्यवस्था को बनाए रेलवे अधिकारियों के पसीने छूट गए. स्टेशन पर पैर रखने की भी जगह नहीं थी. पूछ्ताछ केंद्र पर भी लोगों भीड़ उमड़ी पड़ रही थी. शुक्रवार को मथुरा जंकशन पर पहुँचने वाली ट्रेनों में तिल भर जगह नहीं मिल रही थी. सोचने की बात है कि पिछले दिनों इस तरह के तमाम धार्मिक भीड़ भाड़ में लगातार ऐसी घटनाएं घटी हैं जिन में दर्जनों लोग मारे गए हैं. प्रतिवर्ष मंदिरों भगदड़ मचने और उसमें लोगों के मारे जाने का जैसे दस्तूर सा बन गया है. इसके बावजूद मीडिआ इस तरह के धार्मिक उत्सवों का जोर शोर से प्रचार व महिमा मंडन करता है. इसकी मुख्य वजह यही है कि धर्म राज्य व्यवस्था की तमाम जन समस्स्याओं से जनता का ध्यान हटाने का एक साधन है और पूँजीपतियों का मीडिआ धर्म का उपयोग इसी काम के लिए करता है. अब ज़रा इस बात पर गौर करें कि जिस मान्यता के आधार पर 75 लाख लोगों ने गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगाई उसकी सच्चाई क्या है. आदिवाराह पुराण के अनुसार त्रेता में समुद्र पर सेतु- बंधन के समय हनुमान के मन में विचार आया कि में बड़ा पत्थर सेतु निर्माण के लिए लाऊँ. वे उत्तरांचल से गोवर्धन को उखाड लाए. वे ब्रज से गुज़र रहे थे कि उन्हें पता चला कि सेतु निर्माण हो चुका है और उन्होने गोवर्धन की ब्रज में ही स्थापना कर दी. गर्गसंहिता के अनुसार एक बार पुलस्त्य ऋषि द्रोणाचल पर्वत पर पहुंचे वहाँ वे द्रोणाचल के पुत्र गोवर्धन को देखकर मंत्र मुग्ध हो गए और उसे काशी ले जाने की इच्छा व्यक्त की. द्रोणाचल ने शाप के डर से स्वीकृति तो दे दी पर यह भी कह दिया कि इसे एक बार जहाँ स्थापित कर दोगे वहीं स्थापित हो जाएगा. ब्रज में आकर गोवर्धन ने अपना आकार बढ़ाना शुरू कर दिया और पुलस्त्य के लिए वह बोझ असहनीय हो गया. अतः वे गोवर्धन को तिल तिल भर रोज़ घटने का शाप देकर चले गए. इन दोनों कहानियों में कोई तालमेल नहीं है. अगर कोई व्यक्ति थोड़े से तर्क के साथ सोचे तो स्पष्ट हो जाएगा कि ये दोनों कहानियां पंचतंत्र की तरह गढ़ी हुई कहानियों के सिवा कुछ नहीं हैं.

Wednesday, 6 July 2011

माया महाठगिनी नहीं है

धर्म शास्त्रो में धन दौलत को माया कहा गया है. यह भी कहा जाता है कि माया भ्रमित करने वाली होती है, महाठगिनी होती है आदि आदि. वैराग्य शब्द का अर्थ भी यही है मतलब सांसारिकता से लगाव समाप्त हो जाना. इसमें भी धन दौलत से लगाव न रखना वैराग्य का मुख्य लक्षण माना गया है. धन दौलत को माया कहा गया है. माया ठगिनी एक मुहावरा बन गया है. माया मोह को परम सत्ता यानी ईश्वर को प्राप्त करने के मार्ग में बाधा बताया गया है. दर अस्ल सत्ता वर्ग के लिए धर्म का यही रूप सबसे अधिक उपयोगी है. वह चाहता है धर्म उपदेशक जनता में अधिक से अधिक इस विचार का प्रचार करें. दर अस्ल पैसा अच्छे जीवन स्तर के लिए एक आवश्यक शर्त है. आज के दौर में व्यवस्था ने आम आदमी के सामने बेहद मुश्किलें खड़ी कर दी हैं . पैसे की कीमत बहुत अधिक गिर गई है. गाँव में पहले लोग पूरे दिन भूखे बाज़ार से लौट आते थे पर सौ का नोट नहीं तुड़ाते थे. अब लोग एक सिगरेट के लिए एक हज़ार का नोट तुड़ा देते हैं. पैसे का अवमूल्यन इस क़दर हुआ है कि जिसके पास करोड रुपया भी है वह भी अपना व बच्चों का भविष्य निश्चिंत होकर सुरक्षित महसूस नहीं करता. यही कारण है कि सामाजिक मूल्यों में बेतहासा गिरावट आई है और हर कोई किसी भी उचित या अनुचित तरीक़े से अधिक से अधिक पैसा कमाना चाहता है. धर्म उपदेशक या धर्म गुरू जो लाखों की भीड़ ठेले फिरते हैं कितना ही कहें माया ठगिनी है, माया मोह छोड़कर ईश्वर का भजन करो पर सच्चाई यह है कि पूँजीवदी व्यवस्था ने पैसे के महत्व को इस क़दर सर्वमान्य कर दिया है कि नितांत धार्मिक लोग भी धर्म के हर पाखंड को मान लेते हैं पर माया ठगिनी वाली बात धार्मिक या सामाजिक चर्चा में मानते हुए भी उसे जीवन में नहीं उतार पाते. यही कारण है कि हर धर्म गुरू के पीछे लोगों की लंबी लाइन लगी है फिर भी सामाजिक व नैतिक मूल्यों में निरंतर गिरावट आ रही है. यह बात सिर्फ़ आम धार्मिक लोगों के बारे में ही नहीं है, धर्म को संचालित करने वाले पुजारी व पुरोहित वर्ग में तो और भी घ्रणित रूप में उभर कर आती है. यही वजह है कि धार्मिक क्रिया कलाप संचालित करने वाले आम पुजारी ही नहीं जिन्हें माया मोह से ऊपर समझा जाता है और आम धार्मिक व्यक्ति की दृष्टि में सांसारिकता से ऊपर उठ गया है या भगवान की श्रेणी में आ गया है उसके मरने के बाद उसके पीछे अथाह धन दौलत पता चलती है. हाल ही में साईं बाबा की मौत के बाद लाखों करोड़ की प्रोपर्टी इसका अच्छा उदाहरण है. बाबा रामदेव आशा राम बापू सहित तमाम धर्म गुरू इसके अन्य उदाहरण हैं. अभी तिरुवंतपुरम, केरल के श्री पदमनाभन स्वामी मंदिर में जो एक लाख करोड़ से भी अधिक का खजाना मिला है उसे भी इसी रूप में देखा जाना चाहिए. लेकिन महत्वपूर्ण है इनके प्रति सत्ता का रवैया जानना. मीडिया पौने दो लाख करोड के ए. राजा के घोटाले को घोटाला मानता है परंतु एक लाख करोड से अधिक के इस घोटाले को जनता में सूचना देने लायक भी नहीं समझता( हिंदुस्तान सहित आज के कई अखबारो ने यह खबर नहीं छापी है.) मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि यह संपत्ति मंदिर की ही रहेगी.

Thursday, 23 June 2011

देश साधू महत्माओं को सोंप देना चाहिए

इस देश में साधू, महात्मा, बापू, अध्यात्मिक गुरू जैसे लोगों की जो सामाजिक हैसियत बनी है उससे पता चलता है कि सत्ता में शीर्ष भागीदारी करने वालों में पूँजीपतियों, नेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों के साथ- साथ इस धार्मिक वर्ग की भी सत्ता पर मजबूत पकड़ बनी है. बाबा रामदेव, साईं बाबा ,आशा राम बापू जैसे लोगों ने सत्ता के समानांतर अपना साम्राज्य खड़ा किया है. व्यवस्था पर मजबूत पकड़ रखने वाला यह वर्ग सत्ता वर्ग के लिए पूजनीय है और सत्ता वर्ग इस वर्ग के हर काले कारनामे की अनदेखी करता है. इस वक़्त इस वर्ग के दो बेहद प्रभावशाली व्यक्ति साईं बाबा और बाबा रामदेव लगातार चर्चा में बने हुए हैं. साईं बाबा का हाल ही में निधन हुआ है. इस वक़्त वे अपनी संपत्ति को लेकर चर्चा में हैं. माना जा रहा है कि वे 38 करोड़ के बेड रूम में सोते थे और करोड़ों की नगदी उनके बेड रूम से बरामद हुई है. वास्तव में अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि साईं बाबा ट्र्स्ट के पास कुल कितनी संपत्ति है. दूसरी तरफ़ बाबा रामदेव हैं जो 10 वर्ष पहले साइकिल से चलते थे. मात्र 10 साल में उन्होंने जितनी संपत्ति इकट्ठी की उतनी तो किसी उद्योगपति के लिए अपने उद्योग से इकट्ठा करना भी मुश्किल होगा. कनखल में 10 बीघा में फैला गोदाम और स्वामी रामदेव के भाई राम भरत का प्रशासनिक कार्यालय , औद्योगिक क्षेत्र हरिद्वार में दो फैक्ट्री जिनमें क़रीब 250 आयुर्वेदिक उत्पाद बनाए जाते हैं, 50 एकड़ में फैला पतांजली फूड एवं हर्वल पार्क जिसामे 10 यूनिट काम कर रही हैं, 150 बीघा में फैला पतांजली योगपीठ फेज़ 1, 450 बीघा में फैला पतांजली योगपीठ फेज़ 2, दिल्ली हाइ वे पर 200 बीघा में पतांजली नर्सरी और फ़ैक्ट्री, 800 बीघा में पतांजली योग ग्राम, पतांजली गोशाला जिसामे 500 से अधिक गायें पाली जाती हैं. सर्वप्रिय विहार कॉलोनी में तीन बड़ी बिल्डिंग्स जिनामें उनके रिश्तेदारों के निवास व गोदाम हैं. हिमाचल प्रदेश में तमाम संपत्ति, स्काटलेंड में एक द्वीप. यनी बाबा रामदेव के ट्रस्ट के पास अकूत संपत्ति है. यह बात केवल रामदेव और साईं बाबा के बारे में ही सच नहीं है बल्कि ऐसे धार्मिक गुरुओं व बाबाओं अच्छी खासी संख्या है जिन्होंने अपने इस धार्मिक धंधे से संपत्ति का अंबार लगा रखा है. संत निरंकारी(जिन्होने दिल्ली में जहाँगीर पुरी के पास अरबों की ज़मीन घेर रखी है) आशाराम अपने नाम का ताबीज़, अगरबत्ती आदि तक बेचने का उद्योगधंधा चला रहे हैं. खुद रामदेव ने इतनी दौलत ठगी कर के ही इकट्ठी की है. लडका ःओने की दवा बेचना, जवान होने की दवा बेचना, एड्स व केंसर के इलाज़ का दावा करना ये सब ठगी ही है. वास्तव में इतनी ठगी से भी इतनी दौलत इकट्ठी नहीं की जा सकती जितनी रामदेव के पास है. अगर उनके सारे क्रिया कलापों की पड़ताल हो तो पता चलेगा कि कितने अनुचित काम हैं जिनके द्वारा उन्होंने इस क़दर बेशुमार दौलत इकट्ठी की है. ऐसे ही न जाने कितने संत, बाबा, महात्मा अकूत संपत्ति इकट्ठी कर रहे हैं व्यवस्था जानबूझ कर ऐसे लोगों को बढ़ावा भी दे रही है. उसकी एक वजह यह है कि ये लोग आम आदमी का ध्यान व्यवस्था की खामियों से भटकाए रहते हैं. दिग्विजय सिंह आज यह बात कह रहे हैं कि बाबा कि संपत्ति की जाँच होनी चाहिए क्योंकि बाबा ने उनकी पार्टी के लिए चुनौती खड़ी कर दी है वरना क्या अब तक वे सो रहे थे और उन्हें ख़्वाब में पता चला है कि बाबा ने इतनी संपत्ति ग़लत तरीक़े से पैदा की है. साईं बाबा इसका अच्छा उदाहरण हैं. साईं बाबा के ट्रस्ट के पास कितनी संपत्ति है अभी उसका ठीक - ठीक अनुमान भी नहीं है. जहाँ हाथ डालो वहीं से करोड़ो रुपया निकल आता है. फिर भी किसी पार्टी द्वारा, नेता या मीडिया के द्वारा उसकी आलोचना तक नहीं हो रही. उल्टे मीडिया उन्हें विकास का रोल मॉडल बता रहा है. साईं बाबा की मौत के बाद 26 अप्रेल के हिंदुस्तान ने पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल क़लाम का लेख 'परिवर्तन के अग्रदूत सत्य साईं बाबा' प्रकाशित किया है जिसमें उन्होंने कहा है - क्या निःस्वार्थ सामाजिक बदलाव का बाबा से बड़ा कोई रोल मॉडल हो सकता है. क़लाम ने यह बात यह जानते हुए लिखी है कि साईं बाबा ने यह तमाम दौलत ठगी कर के इकट्ठी की है. चमत्कारों के बल पर ही साईं बाबा भगवान बने थे और हैदराबाद टी.वी रिकॉर्डिंग पी.सी सरकार जैसे तमाम तरीकों से यह बात पूरी तरह साबित हो गई थी कि साईं बाबा के चमत्कार कोरी ठगी हैं. व्यव्स्था ने इन साधू महात्माओं, बाबा बापुओं को अकूत दौलत इकट्ठी क़रने की छूट दे रखी है उससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि जनता में ऐसा संदेश फैला रखा है जैसे बेशुमार दौलत इकट्ठी कर के वे परोपकार का भारी काम कर रहे हैं. लखों करोड की दौलत का मन माना उपयोग करके अगर कोई बाबा एक अस्पताल व स्कूल खुलवा दे और उसके बारे में यह कहा जाए- सामाजिक बदलाव का बाबा से बड़ा कोई रोल मॉडल हो सकता है'(हिंदुस्तान व अब्दुल क़लाम के अनुसार) तो बेहतर यही होगा कि इस देश की व्यवस्था इन बाबाओं के हाथ में सोंप दी जाए. यह व्यवस्था द्वारा स्थापित विचारों का असर है कि लोग इन मुद्दों पर तार्किकता से सोचने के बजाय व्यवस्था द्वारा स्थापित बातों को दोहराते हैं कि यह संपत्ति तो दान में आई है, यह तो ट्रस्ट की है, इसमें बाबा का क्या है वगैरह. वे यह भूल जाते हैं इस तरह तो बड़ी - बड़ी कंपनियों के मालिक भी यही कहते हैं कि वे उसके चेयरमेन हैं और एक अधिकारी की तरह वेतन लेते हैं.

Wednesday, 27 April 2011

.सत्य साईं बाबा जो सत्य नहीं था

'औरों जैसे होकर भी हम बाइज़्ज़त हैं बस्ती में, कुछ लोगों का सीधापन है कुछ अपनी अय्यारी है.' निदा फ़ाज़ली का ये शेर सत्य साईं बाबा पर एकदम सटीक बैठता है. सत्य साईं बाबा ने भी कुछ लोगों के सीधेपन का फ़ाइदा उठाकर और कुछ अपनी अय्यारी द्वारा औरों जैसे होकर भी अपने आपको भगवान मनवा लिया. आज तमाम देशों में क़रीब 60 लाख उनके भक्त भगवान की तरह मानते हैं. दर्ज़नों लोग भगवान बनने की प्रक्रिया में हैं. दुर्भाग्य्पपूर्ण है कि ऐसे लोगों की सच्चाई दुनिया को बताने के बजाय व्यवस्था धर्म और अध्यात्म की झालर- पन्नी लगा कर उन्हें और चमकीला बना देती है. सत्य साईं बाबा का जन्म 23 नव. 1926 ई. को पुट्टपर्थी आंध्र प्रदेश में हुआ था.बचपन का नाम सत्यनारायन राजू था. 14 वर्ष की उम्र में एक बार उन्हें बिच्छू ने काट लिया. वे कुछ दिन बाद ठीक हो गए. इस बीच मनसिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे कुछ असामान्य बातें करते रहे. उसके कुछ समय बाद 20 अक्टूबर 1940 को उन्होंने घोषणा की कि वे शिरडी के साईं बाबा के दूसरे अवतार हैं. उसके बाद साईं बाबा ने चमत्कार दिखाने शुरू किए. वे हवा में हाथ लहरा कर पवित्र राख, अॅगूठी, घड़ी आदि पैदा कर देते थे. शिवरात्रि के दिन वे मुँह से शिव लिंग निकाल कर अपने भक्तों को देते थे. प्रसिद्ध जादूगर पी.सी. सरकार जूनियर ने उनसे कई बार मिलने की इज़ाजत चाही पर उन्हें इज़ाजत मिली नहीं . अंततः पी.सी सरकार ने अपने आप को पश्चिमी बंगाल के बड़े उद्योगपति का बेटा बताया तो साईं बाबा उन्से मिलने को तैयार हो गए. पी.सी सरकार ने साईं बाबा से गिफ़्ट पैदा करने की इच्छा ज़ाहिर की. साईं बाबा एक कमरे में गए फिर उन्होंने हवा में हाथ लहरा कर संदेस(बंगाली मिठाई)पैदा कर पी.सी. सरकार को दे दिए. पी.सी सरकार ने कहा उन्हें संदेश पसंद नहीं हैं और उन्होंने हवा में हाथ लहरा कर रसगुल्ला साईं बाबा को दे दिए. उन्होंने अपना परिचय दिया तो साईं बाबा ने अपने भक्तों से पी सी सरकार को बाहर निकलवा दिया. उसके बाद पी.सी सरकार ने हवा में चीज़ें पैदा करने की साईं बाबा की हर ट्रिक का पर्दाफ़ाश किया. पी.सी सरकार ने उनके बारे में कहा -वे दैवीय शक्ति से संपन्न नहीं हैं. जहाँ तक कि वे अच्छे जादूगर भी नहीं हैं. वे इतने ढोंगी हैं कि उन्होंने सभी जादूगरो का नाम खराब किया हुआ है. मैं सोचता हूँ उन्हें अत्यधिक अभ्यास करना चाहिए. कुछ समय बाद साईं बाबा ने एक मैरिज हौल खुलने के उपलक्ष में एक बड़ा आयोजन किया. आयोजन में हिस्सा ले रहे विशाल श्रोता, जिनमें प्रधानमंत्री पी.वी नरसिम्हा राव भी शामिल थे, के सामने बाबा ने हवा में सोने की चेन पैदा करने का कारनामा किया. बाबा के लिए दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि इसे हैदराबाद दूरदर्शन ने कवर किया था. जब टेप को दोबारा देखा गया तो केमरा ने सच्चाई पकड़ ली. टेप में बाबा का असिस्टेंट चेन दे रहा था बाद में बाबा की पहुँच के चलते हैदराबाद दूरदर्शन ने वह टेप समाप्त कर दिया. इसके बाद भी बाबा के चमत्कार जारी रहे. रक्षा विभाग के पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार एस. भगवंतम के मंद बुद्धि पुत्र के बीमार होने पर बाबा ने उसके शरीर पर भभूति मली और एक लंबी सुई से रीढ़ की हड्डी से पानी निकाल कर ड्रेसिंग करा दी. बच्चा ठीक हो गया. हालांकि बाद में भगवंतम ने कहा- बाबा झूठा है और बाबा से अपने सारे संबंध समाप्त कर लिए.(miracle man or petty magician? On www.saibaba-x.org.uk/15/sunday magazine.html) धार्मिक आस्था व्यक्ति को किस हद तक अंधा बना देती है साईं बाबा इस बात का बहुत बड़ा उदाहरण हैं. उनके चमत्कारों की बार-बार पोल खुली, उनकी जादुई ट्रिकों का पर्दाफ़ाश हुआ, जहाँ तक कि उनके समलैंगिक संबंध भी प्रकाश में आए पर साईं बाबा को मानने वाले भक्तों की संख्या में कमी नहीं आई.उनके अधिकांश भक्त अपर क्लास और अपर मिडिल क्लास के होते थे परंतु आम आदमी से लेकर प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति, सिने अभिनेता, क्रिकेटर्स,आई.ए.एस आदि प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर,इजीनियर्स, वैज्ञानिक सभी उनके भक्तो व प्रशंसकों में शामिल हैं. इन सबके लिए हमारे समाज के वैज्ञानिक बोध के स्तर में कमी होना तो है ही शासक वर्ग व मीडिया द्वारा इन चीज़ों को स्थापित करना भी बड़ा कारण है. मीडिया इस तरह की घटनाओं की सच्चाई बताने के बजाय अत्यधिक मात्रा में उनका महिमा मंडन करता है. दर अस्ल इस तरह की अज्ञानिक बातों की समाज में बड़ी वजह मीडिआ के धुआधार प्रचार के साथ एक चेन सिस्टम का बन जाना है. लोग अपने आप को इस तर्क से संतुष्ट कर लेते हैं कि इतने लोग मानते हैं तो कोई न कोई सच्चाई ज़रूर होगी. ऐसे में बड़े राजनेता, डॉक्टर इजीनियर,प्रशासनिक अधिकारी भी जुड़ जाएँ तो इस तरह के धार्मिक क्रिया कलापों को अत्यधिक मान्यता मिल जाती है. जैसे तेल देशी जड़ी बूटियों से तंबू तानकर इलाज़ करने वाले तथाकथित हक़ीम जनता में विश्वास जमाने के लिए अपने साथ पुलिस वालों की फॉटो खिंचवा कर लगा लेते हैं. इसी तरह मीडिआ अपनी तरह से इन चीज़ों को मैनेज करता है. जैसे 24 अप्रेल सुबह 7:40 पर साईं बाबा की मौत हुई. पूरा मीडिआ साईं बाबा के गुणगान में लगा है. अवसरानुकूल उन लोगों से भी साईं बाबा की प्रशंसा में लिखवा रहा है या कहलवा रहा है जो साईं बाबा के कटु आलोचक रहे हैं. जैसे पी.सी सरकार का ज़िक्र मीडिआ बार-बार कर रहा है-वे कह रहे हैं बाबा के चमत्कार भले ही झूठे हों पर वे उनके परोपकारी कार्यों की प्रशंसा करते हैं . 26 अप्रेल के हिंदुस्तान ने पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल क़लाम का लेख ''परिवर्तन के अग्रदूत सत्य साईं बाबा'' प्रकाशित किया है. उन्होंने लिखा है-बाबा देश के लोगों की बुनियादी ज़रूरतों को लेकर बेहद संजीदा थे,खासकर आंध्र प्रदेश व कर्नाटक के लोगों के लिए. कलाम साईं बाबा के स्कूल,अस्पताल व पेयजल से जुड़े कार्यों की भरपूर प्रशंसा करते हैं और अंत में लिखते हैं - क्या निःस्वार्थ सामाजिक बदलाव का बाबा से बड़ा रोल मॉडल कोई और हो सकता है? एक बाबा जिसका पूरा जीवन धार्मिक ढोंग व पाखंड पर टिका था और जिसने उससे अथाह दौलत इकट्ठी की उसके बारे में एक वैज्ञानिक(?) की इतनी प्रशंसा लोगों के बीच उसको ईश्वर माने जाने की अवधारणा को और पुष्ट करेगी. साईं बाबा ने अपनी धार्मिक पहुँच से अनुमानतः डेढ़ लाख करोड़ की चल-अचल संपत्ति इकट्ठी की. यह स्वामी सेंट्रल ट्रस्ट द्वारा संचालित होती थी. बाबा के अलावा इस ट्रस्ट में 6 न्यासी और 4 सदास्यो वाली प्रबंध परिषद थी.न्यासियों में बाबा के अतिरिक्त पूर्व मुख्य न्यायधीश पी.एन भगवानी, पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त एस.वी. गिरी बाबा का भतीजा आदि शामिल थे. आज जनता में बाबा के सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल, कॉलेज व पेय जल से जुड़े कार्यों की काफ़ी चर्चा है. ऐसे में हाल ही में श्रेया अय्यर की अगुआई में केंब्रिज यूनिवर्सिटी द्वारा भारत में 568 धार्मिक संगठनों पर किया गया शोध याद आता है. शोध में बताया गया है कि धार्मिक संगठानो में व्यापारिक संगठानो की तरह ही कड़ी प्रतिस्पर्धा होती है. वे अपने अनुयाइयों को लुभाने के लिए तरह तरह के जनोपयोगी कार्यों का संचालन करते हैं. वैसे बाबा ने ये परियोजनाएँ चला कर समझदारी का ही काम किया. इतनी अथाह दौलत से कुछ हिस्सा निकाल कर ये परियोजनाएं चलाईं तो आज क़लाम जैसे लोग भी सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा रोल मॉडल बता रहे हैं वरना आज उनके बारे में दो तरह की ही बातें हो रही होती उनके अनुयाई और शासक वर्ग उन्हें भगवान घोषित कर रहे होते तो उनके आलोचक उनके धार्मिक पाखंड व धूर्ता की पोल खोल रहे होते. लेकिन इस देश का दुर्भाग्य 24 अप्रेल 2011 को सत्य साईं बाबा की मृत्यु के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता. लोग प्रेम साईं बाबा के अवतार की तैयारी में जुट गए होंगे. क्योंके 6 जुलाई 1963 को सत्य साईं बाबा ने घोषणा की थी कि साईं बाबा के 3 अवतार होने हैं . पहले शिरडी साईं बाबा .दूसरे वे खुद यानी सत्य साईं बाबा और तीसरे प्रेम साईं बाबा जो उनकी मृत्यु के 8 साल बाद पैदा होंगे. ज़ाहिर है सत्य साईं बाबा भी शिरडी साईं बाबा की मृत्यु के 8 साल बाद ही पैदा हुए थे. 8 साल का अंतराल अधिक होता है और संभव है तब तक कई लोग साईं बाबा के अवतार का दावा करें. स्वाभाविक है वही अपने आप को प्रेम साईं बाबा सिद्ध कर पाएगा जो बड़ी ठगी कर ले जाएगा या सत्य साईं बाबा के प्रभावशाली अनुयाई जिसे षडयंत्रित कर सत्य साईं बाबा के भक्तों के बीच स्थापित कर देंगे. साईं बाबा के बहुत से भक्तों को अभी विश्वास ही नहीं हुआ है कि साईं बाबा मर चुके हैं क्योंके साईं बाबा ने घोषणा की थी कि वे 96 वर्ष की उम्र में यानी 2022 में मरेंगे. उनका विश्वास है ज़रूर कोई चमत्कार होगा और साईं बाबा जीवित हो उठेंगे. जबकि एक भक्त अनिल कुमार का कहना है कि चंद्रमा के कलेंडर के अनुसार वे 96 वर्ष के हो चुके थे. उसने दावा किया है कि एक बार बाबा की छवि उसे चंद्रमा पर नज़र आई थी. कुछ वर्ष पहले यह चर्चा फेल गई थी कि बाबा चंद्रमा में नज़र आएँगे. उस दिन बादल छए हुए थे परंतु अनिल का कहना है कि उसने बाबा को चंद्रमा में देखा था. यह भी विडंबना ही है कि अनपढ़ लोग ही नहीं बेहद पढ़े लिखे लोगों की भी यह धरणा थी कि बाबा की भभूति व आशीर्वाद से बीमार लोग स्वस्थ हो जते हैं परंतु बाबा जब भी बीमार पड़े डॉक्टर ही उनके काम आए. चाहे वे पेरालाइज़ हुए हों तब या उन्हें दो बार हार्ट अटैक हुआ हो तब य उनकी अपेंडिक्स का ऑपरेशन हुआ हो तब अथावा मौत से पहले एक माह तक उनका इलाज़ चला हो तब हमेशा उनकी बीमारी को डॉक्टरों ने ही ठीक किया.