Friday, 30 August 2013

आसाराम को कौन खाद-पानी देता है


आसाराम पर बलात्कार जैसे घिनौने  आरोप के बाद यह बात लगातार चर्चा में आ रही है कि गलती उन लोगों की ही है जो अपनी स्त्रियों को आसाराम जैसे लोगों के पास भेजते हैं,इतना सब कुछ जानने के बाद भी आसाराम जैसे लोगों के अंधभक्त बने रहते हैं.ऐसे समय में इस तरह की चर्चा होना अस्वाभाविक नहीं है.लेकिन इस तरह की चर्चा करने वालों में वे लोग भी हैं जो भले ही आज आसाराम के विरोध में खड़े हैं पर वे आसाराम में न सही उसके जैसे किसी दूसरे आसाराम में विश्वास करते हैं.उनसे इस विषय पर बात करोगे तो वे यही तर्क देंगे कि उनका आसाराम असली है,वह ऐसा बलात्कारी और ढोंगी नहीं है.इस तरह देखा जाए तो सत्रह अगस्त तक उनका आसाराम भी ढोंगी और बलात्कारी नहीं. दरअस्ल देश में जबरदस्त अंधश्रद्धा है उसके बहुत सारे कारण समाज में मौजूद हैं.यह कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं है कि डॉ डाभोलकर ने अन्धविश्वास विरोधी क़ानून बनवाने के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी और उनके इस बिल में अपने आप को भगवान कहने वालों के लिए सज़ा की बात कही गयी थी.देश सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में से एक भाजपा डाभोलकर के विरोध में थी और तथाकथित भगवान् आसाराम पर बलात्कार का आरोप लगते ही वह उसके पक्ष में आ गयी.देश में लोग इस कदर अन्धविश्वासी क्यों बने हुए हैं इस पर तो पूरी एक पुस्तक लिखने की ज़रुरत है हम फौरी तौर पर कुछ कारणों पर नज़र डाल लें तो भी कुछ हद तक बात स्पष्ट हो जाएगी.
आसाराम का मामला धार्मिक है और लोगों की श्रद्धा और आस्था का मामला है.यह कहा जा सकता है कि श्रद्धा होनी चाहिए अंधश्रद्धा नहीं.अगर गौर से देखा जाए तो धर्म के मामले में श्रद्धा और अंधश्रद्धा जैसा कोई अंतर होता ही नहीं है.जो धार्मिक व्यक्ति यह कहता है कि अंधश्रद्धा नहीं होनी चाहिए वह कुछ सेलेक्टिव अंधश्रद्धाओं में विश्वास करता है जिन्हें वह श्रद्धा कहता है, इसी तरह दूसरा धार्मिक व्यक्ति कुछ दूसरी अंधश्रद्धाओं में विश्वास करता हो वह पहले वाले की श्रद्धाओं को अंधश्रद्धा कह सकता है.इस बात को यों भी समझ सकते हैं कि एक बेहद कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति धर्म के मामले में कोई तर्क न कर पाए और आपसे सीधे तौर पर कह दे,आपको मानना है मानो हम तो यों ही मानते हैं,मानो तो देव नहीं मानो तो पत्थर. एक बहुत पढ़ा-लिखा व्यक्ति कुछ देर आपसे बहस करे और उसके बाद कह दे यह तर्क का विषय नहीं है आस्था का विषय है.दरअस्ल धर्म के मामले में यह मूल मन्त्र बन गया है.यही बात आसाराम के भक्तों पर लागू होती है.आसाराम ने बलात्कार किया है या नहीं किया है उनके लिए यह तर्क का विषय है ही नहीं उनके लिए तो यह आस्था का विषय है कि आसाराम भगवान हैं और वे ऐसा कर ही नहीं सकते.इसी तरह दूसरे लोग जो इसे इनकी अंधश्रद्धा कह रहे हैं, वे कभी यह मानने को तैयार नहीं होंगे कि हमारे तीन-तीन ईश्वर एक महिला सती अनुसुइया को नंगा होकर खाना खिलाने को कहें या देवताओं का राजा इंद्र अहिल्या नाम की महिला के सत की परिक्षा करने के लिए उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाए इस तरह की बातों में विश्वास करना अंधश्रद्धा है.आसाराम जैसा ही काम कोई देवता या ईश्वर करे तो लोगों की आस्था में देवता या ईश्वर के प्रति कोई कमी नहीं आती ऐसे ही आसाराम के भक्तों में भी अपने भगवान् के प्रति कोई कमी नहीं आती.
समाज में अंधश्रद्धा के इतने साज़ो-सामान हैं कि आसाराम जैसे दुराचारी व अपराधी व्यक्ति के भी लाखों-करोडो अंधभक्त आसानी से बन सकते हैं.सबसे पहले तो हमारी राजव्यवस्था ही इसे बेहद बढ़ावा देती है.आसारामों से अटल बिहारी,आडवानी,इंद्रा गांधी सब आशीर्वाद लेकर यह सन्देश देते हैं कि इन्ही कि कृपा से देश चल रहा है.सिर्फ नेता ही नहीं कोर्ट तक इन लोगों को बढ़ावा देता है.निर्मल बाबा कृपा बाँटते हैं.वे भक्तों को गोलगप्पे खिलाकर या काला कुत्ता दिखा कर कृपा देते हैं.इस पर किसी ने जनहित याचिका डाल दी तो कोर्ट ने फैसला दिया कि वे ऐसे उल-जुलूल उपाय न बताएं.मतलब वे अपना धंधा चलाएं पर लोगों की आस्था के साथ इतना मूर्खता पूर्ण मजाक न करें.निर्मल बाबा मान गए .टीवी देखिए वे आजकल लोगों की आस्था से इतना मूर्खतापूर्ण मजाक नहीं करते.राज्यव्यवस्था ऐसा क्यों चाहती है यह समझना भी कोई मुश्किल काम नहीं है.वर्तमान व्यवस्था ने आम आदमी की ज़िंदगी इतनी मुश्किल बना दी है कि अगर वह उसे चला पाने में समर्थ हो जाता है तो उसे दैवीय चमत्कार समझने लगता है.नौकरी पाने के लिए,केस जीतने के लिए बच्चों के रिश्तों के लिए हर काम इतना मुश्किल है कि लोग सहज ही ज्योतिषी,बाबा, पीर फकीर के चक्करों में पड़ जाते हैं .एक परचून की दूकान डालने से लेकर बिजनेस डालने तक ज़बरदस्त संघर्ष है.ऐसे में आसाराम उन्हें एक ताबीज़ दे दे और उनका धंधा चल जाए तो वे आसानी से उसके भक्त बन जाते हैं.इस केस में भी लड़की के पिता का साधारण सा परिवार था .उन्होंने ट्रांसपोर्ट का काम डाला,वे आसाराम से मिले,मेहनत की धंधा चल निकला और पूरा परिवार आसाराम का भक्त बन गया.ऊपर से व्यवस्था में इतनी अराजकता है कि लोगों को लगता है सब कुछ ईश्वर ही चला रहा है.
    समाज पर सबसे अधिक प्रभाव मीडिया का है.टीवी,फ़िल्में ,अखबार हर जगह तंत्र,मन्त्र,चमत्कारों का बोल बाला है.हनुमान यंत्र शुभ धन वर्षा जैसे कितने ही विज्ञापन टीवी पर आते हैं जो हर समस्या तीन-चार हज़ार में हल कर देते हैं.महादेव,सावित्री जैसे सेरिअलों में ही नहीं जोधा-अकबर जैसे ऐतिहासिक सीरियलों में भी अंधविश्वासों को बढ़ावा दिया जाता है. गणेश के दूध पीने की खबरें चंद मिनिटों में दुनिया भर में फ़ैल जाती हैं.लोगों को अन्धविश्वासी बनाए रखने में मीडिया ज़बरदस्त माहौल तैयार करता है लोगों का यही अंधविश्वास आसारामों को जन्म देता है.
    तमाम सामाजिक वजहों से परिवारों में तमाम तरह के धार्मिक पाखण्ड चलते रहते हैं और ऐसे परिवारों में बच्चा पैदा होता है तो उसमें यही पाखण्ड जन्मजात लक्षणों की तरह पनप जाते हैं.बच्चा बड़ा होकर डॉक्टर बन जाए,इंजीनियर बन जाए या वैज्ञानिक बन जाए इन लक्षणों को अपने अन्दर से निकालना बहुत मुश्किल होता है. यही वजह है कि आसारामों के अंधभक्तों में डॉक्टर,इंजीनियर,वैज्ञानिक सब होते हैं